जज़्बातों का पिटारा
चेहरे पे उसकी मासूमियत और आंखो मैं हल्की सी शरारत वो रोए तो सबके माथे पे शिकन सी आ जाए और हंसे तो लगे की चांद भी मुसकाए हर जज़्बात इस नन्हे बच्चे मैं है समाए इसलिए जज़्बातों का पिटारा ये कहलाए जब मस्ती में भरी आंखों कि जब ये सबको झलक दिखाए तब अोफिस, स्कूल, घर सबकी परेशानियां जैसे इसमे ही घुल जाए जब गुलाब से मुलायम होंटो की चोंच बना कर ये कुछ बोलना चाहे तब मम्मा बोलो, चाचा बोले केह कर घर में सब बच्चे बन जाए जब ज़ोर ज़ोर से आंसू टपकाकर जब ये रोना चाहे तब बाहर घूमते भाऊ - भाऊ और म्याऊं - म्याऊं को देखकर भी खिल खिलाकर हसना जाए जब सबको गौर से देखना ये सीख जाए तब सबकी नकल उतारकर ये सबका मज़ाक उड़ाए हर जज़्बात इस भोलेपन में समाए इसलिए जज़्बातों का पिटारा ये कहलाए