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जज़्बातों का पिटारा

 चेहरे पे उसकी मासूमियत  और आंखो मैं हल्की सी शरारत वो रोए तो सबके माथे पे शिकन सी आ जाए और हंसे तो लगे की चांद भी मुसकाए हर जज़्बात इस नन्हे बच्चे मैं है समाए इसलिए जज़्बातों का पिटारा ये कहलाए जब मस्ती में भरी आंखों कि जब ये सबको झलक दिखाए तब अोफिस, स्कूल, घर सबकी परेशानियां जैसे इसमे ही घुल जाए                          जब गुलाब से मुलायम होंटो की चोंच बना कर ये कुछ बोलना चाहे तब मम्मा बोलो, चाचा बोले केह कर घर में सब बच्चे बन जाए                          जब ज़ोर ज़ोर से आंसू टपकाकर जब ये रोना चाहे तब बाहर घूमते भाऊ - भाऊ और म्याऊं - म्याऊं को देखकर भी खिल खिलाकर हसना जाए जब सबको गौर से देखना ये सीख जाए तब सबकी नकल उतारकर ये सबका मज़ाक उड़ाए हर जज़्बात इस भोलेपन में समाए  इसलिए जज़्बातों का पिटारा ये कहलाए

शाम से रात की मुलाकात

 शाम से रात की मुलाकात, जैसे चांद की आसमान से मुलाकात जैसे माथे की शिकन की सुकून से मुलाकात जैसे दिनभर की थकान की मुस्कुराहट से मुलाकात शाम से रात की मुलाकात, जैसे बिखरे गुलाब से रंगो की चांदनी से मुलाकात जैसे बेचैन खामोशी की चुप शोर से मुलाकात जैसे खूबसूरत फूलों की मीठी नींद से मुलाकात शाम से रात की मुलाकात, जैसे घर लौटते पंछियों की निखरते तारों से मुलाकात जैसे सुखी पत्तियों के इंतज़ार में ज़मीन से मुलाकात जैसे तेज़ सांसों की धीमी बासुरी से मुलाकात शाम  से रात की मुलाकात

अंधेरा

 अगर बुराई का प्रतीक है अंधेरा, तो इसमें सुकून बेहता क्यों है अगर खामोशी की दास्तान है अंधेरा तो रातों की नींद क्यों है अगर तन्हाई की बात है अंधेरा तो इन उदास आसुओं के साथ क्यों है अगर राजों को दबाता है अंधेरा तो ख्वाबों को छुपाता क्यों है  इतना ही बेजान है अंधेरा तो रात का राजा चांद क्यों है अंधेरे में खुली आंखों को ये रोशनी की दरारें बंद कर देती हैं अगर नींद की खुमारी है अंधेरा तो रोशनी खुली आंखों से देखा ख्वाब क्यूं नहीं है अगर अंधेरे का रंग है काला तो खुशी रंगीन क्यूं नहीं है अगर एक झलक सी मुलाकात है अंधेरा तो लंबा इंतजार क्यूं है अगर किसी की शायरी की झलक है अंधेरा तो किसी खुशबू की मिठास क्यूं है अगर बेहती हवा का झोंका है अंधेरा तो भीगी बरसात क्यूं है

चांद से मुलाकात

  ये चांद भी आज कल कितनी गुस्ताखियां करने लगा है खुद की खूबसूरती भुला कर इन तारों से जलने लगा है अपने आप को बढ़ा कर दूसरों को ढकने लगा है शायद भूल गया है कि ये वही प्रजा है जिसने इसे राजा का दर्जा दिया है क्यूं ये चांद मुझे बदला बदला सा लगने लगा है। ये चांद भी आजकल बड़ा संवरने लगा है रात पर राज करने की चाहत थी इसे जो ये कबकी पूरी कर चुका है खुद पर इसे घमंड आ गया है  भूल गया है शायद के आखिर ये पत्थर का ही बना है क्यूं ये चांद मुझे गुरूर सिर पे लिए भटकता दिखने लगा है। ये चांद भी आजकल उदास सा रहने लगा है टूटते दिलों और शायरों की कलम का साथ छोड़ने लगा है जो पहरा जमाया था इसने आसमान की छत पर उसका नुकसान भुगतने लगा है पता नहीं कितने लोगों का गम देखा है इसने जो आसुओं को भी बादलों से ढकने लगा है क्यूं ये चांद आजकल खामोश सा रहने लगा है।

मौसम से बात

 अनजान थे हम इन हवाओं के बीच जो गुफ्तगू सी हुई थी  नमालूम थी शिकायतें जो आज इस हवा ने चिल्ला चिल्ला कर कही थी पता नहीं वो क्या था जिसका अंजाम कुछ यूं हुआ था की इन हवाओं के शोर में भी एक खामोशी सी छुपी थी आज मौसम से बात कुछ खामोशी वाली हुई थी बादलों के अंदर एक तूफान उठा था कुछ ऐसा ये गम था जो गरज गरज कर भी ये समझा नहीं सका था जब इस सैलाब को आसुओं के जरिए बाहर आना मुकम्मल लगा था तब पता चला है दर्द समझने के लिए नहीं सिर्फ महसूस करने के लिए बना था आज मौसम से बात कुछ नाराज़गी वाली हुई थी ये बारिश की बूंदें भी दर्द बहा कर ला रही थी मिट्टी पर पड़ते ही अपना दर्द खुशबू के साथ फैला रही थी चेहरे को छूते ही एक खुशी सी महसूस करवा रही थी पर अंदर ही अंदर कुछ तो है जो चुप रही थी आज मौसम से बात कुछ दर्द वाली हुई थी ये अंधेरा जो चारों तरफ छाया हुआ था इसने भी अपने अंदर कुछ दफनाया हुआ था इसको भी फैलने की पता नहीं क्या रिश्वत दी होगी इसका एक एक ज़र्रा बेचैनी से चीखना चाह रहा था आज मौसम से बात कुछ बे इमानी वाली हुई थी

ये उन दिनों की बात है

 उदास दिल, मायूस चेहरा चारों ओर गम का माहौल था फैला पता नही क्या थी वो बात  जब खामोशी ने अपना दबदबा था फैलाया मेरी ही कोई ज़िद थी शायद  जिसने सबको गुस्सा था दिलाया माहौल जो याद आया था  उसने चीख चीख कर बतलाया था की बात ज़रूरी ही होगी  जिसने य माहौल फैलाया था ज़ोर दिमाग पर डाला तब वो बात समझ आयी अपने साथ एक मुस्कान भी थी लाई बस immaturity आगे थी आई इसने ही बिना बात की बात थी बनाई ये उन दिनों की बात है, जब नाक पर गुस्से ने जमाया था डेरा और दुनिया ने हमे teenagers था बुलाया अंधेरा, अंधेरा, अंधेरा हर जगह अंधेरे ने पहरा था जमाया बहुत कोशिशों के बाद भी रोशनी को ढूंढ नहीं था पाया उम्मीदें जब हुई खत्म दिल में था थोड़ा गम जब थक हार कर बैठे हम तब यूं लगा जैसे दुनिया हो गई ख़तम पल्कें जब उठी तब पता चला रोशनी ने  तो चारों कोनों कों था घेर रखा बात सिर्फ़ इतनी ही थी कि हमने ही अपनी आंखे बंद रखी थी ये उन दिनों की बात है, जब आंखें भी नहीं खुली थी  और दुनिया देखने का दावा करते थे हम Teenagers कहलाया करते थे हम

Happy children's day

 14 November, children's day - Aaj chacha Nehru ke bachchon ka diwas hai Chintu,Mintu, Sonu,monu har bachche ko wish kiya hai 1,2,3,4,5,6 haan itni chocolate kaafi hai, itne hi toa bachche Hain - kehkar sabke liye chocolate ka intezaam kiya hai Ek wish aur ek chocolate toa abhi bhi Kam hai tumhe kya pataa hai Haan ye wohi bachcha hai, jo tumhare andar chupa hai Happy children's day, tumhare andar ke uss bachche ko Jo abhi bhi mobile mein doremon aur shinchan dekhta hai Jo abhi bhi mirror mein dekh kar ajeeb ajeeb se chehre banata hai Jo Abhi bhi kisi billi ko dekh kar ek baar meow zaroor karta hai Jo abhi bhi gali mein bat ball dekh kar ek baar batting zaroor mangta hai Jo Abhi bhi gate ke peeche chup kar kisi ko zor se darane ki koshish karta hai Jo ek baar phir se bachcha ban kar jeena chahta hai Happy children's day to the child in all of us.