चांद से मुलाकात
ये चांद भी आज कल कितनी गुस्ताखियां करने लगा है खुद की खूबसूरती भुला कर इन तारों से जलने लगा है अपने आप को बढ़ा कर दूसरों को ढकने लगा है शायद भूल गया है कि ये वही प्रजा है जिसने इसे राजा का दर्जा दिया है क्यूं ये चांद मुझे बदला बदला सा लगने लगा है। ये चांद भी आजकल बड़ा संवरने लगा है रात पर राज करने की चाहत थी इसे जो ये कबकी पूरी कर चुका है खुद पर इसे घमंड आ गया है भूल गया है शायद के आखिर ये पत्थर का ही बना है क्यूं ये चांद मुझे गुरूर सिर पे लिए भटकता दिखने लगा है। ये चांद भी आजकल उदास सा रहने लगा है टूटते दिलों और शायरों की कलम का साथ छोड़ने लगा है जो पहरा जमाया था इसने आसमान की छत पर उसका नुकसान भुगतने लगा है पता नहीं कितने लोगों का गम देखा है इसने जो आसुओं को भी बादलों से ढकने लगा है क्यूं ये चांद आजकल खामोश सा रहने लगा है।