मौसम से बात
अनजान थे हम इन हवाओं के बीच जो गुफ्तगू सी हुई थी
नमालूम थी शिकायतें जो आज इस हवा ने चिल्ला चिल्ला कर कही थी
पता नहीं वो क्या था जिसका अंजाम कुछ यूं हुआ था
की इन हवाओं के शोर में भी एक खामोशी सी छुपी थी
आज मौसम से बात कुछ खामोशी वाली हुई थी
बादलों के अंदर एक तूफान उठा था
कुछ ऐसा ये गम था जो गरज गरज कर भी ये समझा नहीं सका था
जब इस सैलाब को आसुओं के जरिए बाहर आना मुकम्मल लगा था
तब पता चला है दर्द समझने के लिए नहीं सिर्फ महसूस करने के लिए बना था
आज मौसम से बात कुछ नाराज़गी वाली हुई थी
ये बारिश की बूंदें भी दर्द बहा कर ला रही थी
मिट्टी पर पड़ते ही अपना दर्द खुशबू के साथ फैला रही थी
चेहरे को छूते ही एक खुशी सी महसूस करवा रही थी
पर अंदर ही अंदर कुछ तो है जो चुप रही थी
आज मौसम से बात कुछ दर्द वाली हुई थी
ये अंधेरा जो चारों तरफ छाया हुआ था
इसने भी अपने अंदर कुछ दफनाया हुआ था
इसको भी फैलने की पता नहीं क्या रिश्वत दी होगी
इसका एक एक ज़र्रा बेचैनी से चीखना चाह रहा था
आज मौसम से बात कुछ बे इमानी वाली हुई थी
🙌🙌🙌❤️❤️❤️
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❤❤❤
nice
ReplyDeleteVery nice
ReplyDeleteSuperb
ReplyDeleteGood one 👌👌👌
ReplyDeleteAesthetically composed
ReplyDeletemasha Allah..
ReplyDeletebhut khob.❤❤
Jazakallah☺
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